-बीसलपुरा गांव में हो रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भरत चरित्र का हुआ वर्णन

भिण्ड। जब भगवान राम अपने नर स्वरूप को त्याग कर बैकुंठ धाम जा रहे थे तब मुनि वशिष्ठ ने उनसे पूछा कि जाने से पहले इतना तो बता दीजिए कि भरत कौन हैं। इस प्रश्र का उत्तर देते हुए भगवान राम ने कहा कि जो नि:स्वार्थ भाव से कर्म करता रहे वह भरत है। उक्त बात बीसलपुरा गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन पं.रामप्रसाद व्यास सिहोनिया वालों ने व्यास गद्दी से कही।
भागवत सिरोमणी पं रामप्रसाद व्यास सिहोनिया वालों ने अपनी विद्वतापूर्ण वाणी से शनिवार को भरत चरित्र के विषय पर प्रकाश डालते हुए सटीक चित्रण किया। उन्होंने बताया कि जब राजा दशरथ के चार बेटे पैदा हुए तो उनका नामकरण किया गया। जिसमें राम को देखकर वशिष्ठ जी पहचान गए कि ये तो साक्षात नारायण हैं। जब लक्ष्मण जी को उनके सामने लाया गया तो कहा कि ये तो राम का अभिन्न अंग रहकर राम के साथ ही रहेगा। शत्रुध्र को लाया गया तो उन्होंने कहा कि इसके स्मरण मात्र से ही शत्रुओं का नाश हो जाया करेगा। सबसे बाद में जब भरत को लाया गया तो मुनि श्री ने कहा कि विश्व भरण पोषण कर जोहि ताकर नाम भरत असि होई।
भरत नाम नहीं भरत तो कर्म है कर्म की व्याख्या करते हुए बताया गया कि कर्म कोई बड़ा या छोटा नहीं होता है लेकिन उसका उद्देश्य बड़ा होता है। एक बार जब लोग गंगा जी स्नान जा रहे थे तब संत रैदास ने कहा कि हम भी गंगा स्नान को चलेंगे। तभी एक गांव में बच्चियों के रोने की आवाज आ रही थी। और वह अपनी मां से कह रहीं थीं कि पांच दिन से भूखी हूं रोटी दो। इस पर बच्चियों की मां ने कहा कि मैं कहां से लाऊं, इस बात को सुनकर संत रैदास ने गंगा स्नान बीच में छोड़कर उसकी मां को रोटियां दे दीं और आगे बढ़ गए। जब शंकराचार्य गंगा स्नान करने लगे तो आवाज आई कि आज का फल तो रैदास को दे दिया गया है जिसने गरीबों की सेवा की है।
श्रोतागण हुए भाव विभोर
भरत का पूरा चरित्र इसी में रचा बसा है कि गुरु वशिष्ट ने पूछा कि भरत आखिर है क्या तो राम ने बताया कि जीवन में कभी कोई आशा नहीं है केवल कर्म ही कर्म है वह भरत है। गुरु वशिष्ठ ने कहा कि आज तक मैने किसी को भी आत्मा से आशीर्वाद नहीं दिया है राजा दशरथ को आशीर्वाद दिया होता तो उन्हें यज्ञ नहंीं कराना पड़ता। इतना सुनते ही पंडाल में बैठे हुए सभी श्रोतागण भाव विभोर हो गए। इस अवसर पर प्रेस क्लब अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा अपनी पत्नी शांतिदेवी तथा पुत्र संजय शर्मा के साथ कथा स्थल पर मौजूद रहे और व्यास गद्दी पर बैठे पंडित जी से आशीर्वाद लिया।
कैप्सन: 4 बीएचडी 6 व 7